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D is for Depression: The Health Collective Interview (Hindi)

August 15, 2017

This interview with Shubhrata Prakash, author of 'The D Word' is on our site in English here; it is translated into Hindi in partnership with the team at Newsroom Post.

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1)       अगर आप पीछे मुड़कर देखें तो आपकी इस यात्रा का सबसे कठिन भाग क्या रहा है?

अवसाद की इस यात्रा का सबसे कठिन भाग ‘बुरे दिनों’ को काटना रहा है। अवसाद के दौन अपनी बदली हुई सोच को लेकर जागरुक रहना पड़ता है। हर नकारात्मक विचार को यह समझकर निकालना पड़ता है कि यह मैं नहीं सोच रही- यह विचार अवसाद मेरे दिमाग में डाल रहा है। सामाजिक कलंक एवं संकीर्ण सोच से जूझना भी बहुत कठिन रहा है।

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2)       क्या कोई ऐसी बात है जो आपको लगता हो कि काश आपको और आपके प्रियजनों को और पहले पता होती?

मुझे यह जरूर लगता है कि अगर समाज में अवसाद को लेकर अदिक जागरूकता होती तो मुझे अपने प्रसवोत्तर अवसाद की समझ पहले हो गई होती। मेरे प्रियजन भी उसी समाज का एक हिस्सा हैं।

 

3)       आपके विचार में, मानसिक रोगों से जूझ रहे लोगों की जीवनी या उनके निजी अनुभवों की लेखनी पढ़ना कितना उपयोगी है? आपने अपनी पुस्तक में ‘डॉ. गूगल’ का उल्लेख किया है।

मानसिक रोगों, विशेषकर अवसाद से ग्रस्त अन्य व्यक्तियों के निजी अनुभवों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है। अवसाद पर बहुत विस्तारित अनुसंदान हो रहा है, लेकिन अभी भी ये स्पष्ट तौर पर तय नहीं हो पाया है कि अवसाद होने की क्रम-वश प्रक्रिया क्या है; अतः अबी तक अवसाद का कोई सटीक इलाज तय नहीं हो पाया है। इसलिए दूसरों के अनुभवों से बहुत जानकारी प्राप्त होती है। अवसाद के लक्षण दूसरों के लिए क्या हैं, कैसे अवसाद देश, जाति, धर्म, आर्थिक स्थिति, शैक्षणिक योग्यता एवं लिंग में भेद नहीं करता है और किसी को भी ग्रसित कर सकता है। दूसरे कैसे प्रत्येक दिन इस रोग पर अंकुश लगा कर जीते हैं। इन सबसे अवसाद के अंधेरे में रौशनी दिखती है।

भारत में जहां अवसाद के रोगियों की संख्या मनोचिकित्सकों की संख्या से कई गुणा अधिक है। वहीं अवसाद से ग्रस्त लोगों के लिए और भी आवश्यक है कि वह अपने आप को जानकार बनाए रखें। गूगल के विषय में एक चेतावनी कि उस पर पढ़ी हुई हर चीज सही नहीं होती है ऐसे में अपनी सूझ-बूझ का प्रयोग करें।

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4)       आप और आपके पति, दोनों सरकारी सेवा में कार्यरत हैं, जिसमें स्थानांतरण होते रहते हैं। इसके कारण आपको कोई विशेष परेशानी हुई है? आपकी पुस्तक में इस विषय पर कोई टिप्पणी?

समय-समय पर स्थानांतरण होना सरकारी सेवा का एक अभिन्न अंग है। जैसा कि मैंने अपनी पुस्तक में लिखा है, कभी स्थानांतरण हमारे निवेदन पर हुआ, कभी आकस्मिक हुआ। स्थान बदलने से परेशानियां तो होती हैं। आप एक जगह पर अपने आप को स्थिर करते हैं, अपने मनोचिकित्सक एवं मनोवैज्ञानिक के साथ एक विश्वासपूर्ण संबंध बनाते हैं और फिर स्थानांतरण हो जाता है।

लेकिन, यह भी सच है कि सरकारी अधिकारी होने की वजह से हम उस सामाजिक एवं आर्थिक वर्ग में हैं जिसके लिए स्वास्थ्य एवं मनोवैज्ञानिक सेवाओं तक पहुंचना आसान है। यहां तक कि बैंगकॉक में भी मेरा इलाज एक अंतरराष्ट्रीय अस्पताल में हो पाया। मैं, साथ ही साथ, यह भी कहना चाहूंगी कि मेरे एवं मेरे पति के सहकर्मियों ने हमारे साथ बहुत सहयोग किया और इसके कारण मेरे मानसिक रोग से जूझना मेरे परिवार के लिए थोड़ा आसान हो गया।

 

5)       आपने अवसाद एवं मानसिक रोगों से संबंधित कई मिथ्याओं एवं गलत धारणाओं की चर्चा की है। लेकिन अंधविश्वास के बारे में अधिक नहीं कहा है। आपने दवाओं के सेवन अकस्मात छोड़ने को मना किया है। आपके विचार?

अवसाद जैसे मानसिक रोगों से लड़ते हुए मेरे अनुभव विविध रहे हैं। समाज में अवसाद एवं अन्य मानसिक रोगों को लेकर कई भ्रांतियां हैं। लोगों का अभी भी ये मानना है कि अवसाद केवल उदासी है। अधिकांश समाज को यह जानकारी नहीं है कि अवसाद एक दिमागी रोग है। जिसमें दिमाग में कई प्रकार के भौतिक रासायनिक एवं विद्युतिय क्रिया संबंधित बदलाव पाए जाते हैं। अतः अवसाद एक मानसिक एवं शारीरिक रोग है। यह जानकारी लोगों तक पहुंचाना अत्यंत आवश्यक है।

 

अवसाद के उपचार में उपयोग होनेवाली दवाओं के विषय में मैंने अपनी पुस्तक में काफी विस्तारित चर्चा की है। अबी तक यह तय नहीं हो पाया है कि अवसाद कैसे एवं क्यों होता है। इसलिए अवसाद का इलाज एवं दवाएं अभी भी एक प्रयोगिक स्तर पर हीं है। इन दवाओं का प्रभाव एवं दुष्प्रभाव दोनों ही संभव एवं अप्रत्याशित है। दो रोगी- ‘क’ एवं ‘ख’ दवा ’ग’ लेते हैं। रोगी  ‘क’ को दवा का कोई दुष्प्रभाव नहीं हो लेकिन रोगी ‘ख’को ऐसे दुष्प्रभाव हों जिससे उसकी जान को खतरा हो जाए। ऐसा संभव है। मुझे स्वयं दो बार अवसाद की दवा धीरे-धीरे बंद करना पड़ा क्योंकि मुझे उनसे कोई फायदा नहीं हो रहा ता। बल्कि इनके दुष्प्रभावों से मेरी जिंदगी और भी अधिक उलझ गई थी।

एक बात की चेतावनी मैं जरूर देना चाहूंगी। अवसाद की दवा(एंटी-डिप्रेसेंस) को रोगी अकस्मात बंद ना करें। इससे ‘विथड्रॉउल’ हो सकता है। जो कि कष्टकारी एवं हानिकारक हो सकता है।

 

6)       जब अवसाद परेशान करता है, तब उम्मीद रखना मुश्किल हो जाता है। आप ऐसी स्थिति में क्या करती हैं?

मुझे जब भी अवसाद अधिक ग्रस्त करता है और ऐसा लगने लगता है कि जीवन का कोई अर्थ नहीं है तब मैं अपने मन को अपने परिवार रूपी खूंटे पर टांग देती हूं। अपने पति एवं बच्चों को याद करने से जीवन फिर से रंगीन लगने लगता है। आप भी अपने जीवन में कोई ऐसा केंद्र बिंदू ढूंढें और उसके सहारे ‘बुरे दिन’ निकाल लें।

 

7)       वह कौन सी प्रमुख बात है जो कि अवसाद ग्रसित लोगों के प्रियजनां को हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए, कुछ जो आपने अपनी पुस्तक में लिखा हो?

परिवार, प्रियजनों एवं समाज से मैं यह कहना चाहती हूं कि हमेसा याद रखें अवसाद एक मानिसक रोग, एक दिमागी बीमारी है। अवसाद के कारण जो भी बदलाव आते हैं मसलन उदासी, नकारात्मक विचार आलस, शारीरिक कमजोरी, रोने के दौरे, घीलापन यह सब दिमागी बदलाव का नतीजा है, ना कि अवसाद ग्रसित व्यक्ति की मंशा।

जैसे की बुखार में शारीरिक तापमान बढ़ जाता है वैसे ही अवसाद में उदासी, रोना, कमजोरी, इत्यादि होते हैं। आप इसे स्वीकारें। अपने अवसाद ग्रसित प्रियजन को प्यार, साहनुभूति एवं स्वीकृति दें। यही उनके आरोग्य प्राप्ति की ओर पहला कदम है। 

 

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